हर दाव से ज्यादा इक शराफत हमपे भारी है। अदावत करोगे हमसे औकात क्या तुम्हारी है। उसपे असर क्या करेगी बता अंजाम की बातें, जिसने तमाम जिंदगी अपनी इक साईकिल पे गुजारी है। .....मिलाप सिंह भरमौरी
धूल जमी हो पर्दे पर तो उसको झाड़ा जा सकता है। धूमिल पड़ चुकी परिपाटी को फिर से निखारा जा सकता है। निराश न हो गर गलत हो गया, शायद तजुर्बा कच्चा था। कुछ भी नहीं मुश्किल है यहाँ...
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