बहुत दिनों से उनसे बात नहीं हुई है।
बादल तो बहुत आए, पर बरसात नहीं हुई है।
ये बरसेंगे जरूर मेघ और बुझेगी तिशनगी भी।
अभी हवाओं की नमी से ,उस कद्र मुलाकात नहीं हुई है।
धूल जमी हो पर्दे पर तो उसको झाड़ा जा सकता है। धूमिल पड़ चुकी परिपाटी को फिर से निखारा जा सकता है। निराश न हो गर गलत हो गया, शायद तजुर्बा कच्चा था। कुछ भी नहीं मुश्किल है यहाँ...
खूब लडे तुड़वाए सिंग समय - समय पर फिर मारेंगे डिंग। फिर भी मिलकर जोतेगें खेत जिसमें फसलें उगेंगी अनेक। तोड़ी हैं मेंडे गर आज तो खुशहाली भी हम ही लाएंगे। जो आज देख के खुश हो रहे लड़ाई वो कल हमारे सौहार्द से जल जाएंगे। ......मिलाप सिंह भरमौरी
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